Home भ्रष्टाचार कार्यपालन यंत्री एसडीओ और मानचित्रकार को पांच पांच साल की सजा

कार्यपालन यंत्री एसडीओ और मानचित्रकार को पांच पांच साल की सजा

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लोकायुक्त की जांच पर विशेष न्यायालय ने कार्यपालन यंत्री, ए ई और मानचित्रकार को 05-05 वर्ष का कठोर कारावास एवं जुर्माना की सजा दिया।

उमरिया – जिले में भ्रष्टाचार की परत खुलना चालू हो गई। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग यानी पीएचई विभाग के ई ई, ए ई, और मानचित्रकार द्वारा किये गए कृत्य इस प्रकार हैं।
वर्ष 2005 में ताला मानपुर में आर.सी.सी. ओव्हर हेड टैंक एवं सम्पवेल कम पम्प हाउस निर्माण हेतु पुनरीक्षित निविदा 05/2004-2005 आमंत्रित की गई थी जिसके लिए 10 निविदाकारों ने अपनी-अपनी निविदाओं में निविदा दर का उल्लेख कर प्रेषित किया गया था, इसके पश्चात् अभियुक्त द्वय व्ही. के. मरावी एस.डी.ओ. और मानचित्रकार आर.एल. विश्वकर्मा के द्वारा सभी निविदाकारों के समक्ष की निविदा दरें खोली गयी और उसका विवरण निविदा ओपन पंजी प्र०पी० 38 में दर्ज किया गया जिसमें व्ही. के. मरावी ने सहमति स्‍वरूप अपने हस्ताक्षर किये। निविदा ओपन पंजी के सरल क्रमांक 5 में मेसर्स के.बी. गुप्ता क्योतरा बांदा उ.प्र. रिवाईज्ड ऑफर ओ.एच.टी. के स्तम्भ में रूपये 9.00 लाख एवं रिवाईज्ड ऑफर ऑफ सम्पवेल के स्तम्भ में रूपये 4,19,500/- लेख है। मेसर्स के.बी. गुप्ता की निविदा सबसे कम 4,19,500 /- रूपये थी और उसे टेण्‍डर प्राप्त हुआ था। शिकायतकर्ता के.बी. गुप्ता का नाम निविदा दर अभिलेख पर आ जाने के पश्चात् वह अपने घर चला गया। फिर उसे लगभग एक माह बाद ज्ञात हुआ कि उसकी निविदा दर न्यूनतम होने के बावजूद मेसर्स मोहनदयाल भार्गव के फर्म के प्रोपराईटर महेश भार्गव जिनकी द्वितीय न्यूनतम दर प्राप्त हुई थी जिसने कार्यपालन यंत्री से सांठ-गांठ कर एवं कुछ नगद रूपये लेकर उन्हें प्रथम न्यूनतम दर कर दिया गया और सम्पवेल निर्माण की निविदा स्वीकृत करने हेतु उच्च अधिकारियों को भेजी गयी है जो निविदा प्रक्रिया के विरूद्ध है । उपर्युक्‍त तथ्यों के संबंध में प्रथम निविदाकार किशन बाबू गुप्ता ने मुख्य अभियंता लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जबलपुर के समक्ष लिखित शिकायत प्र०पी० 39 प्रस्तुत की और उसकी प्रतिलिपि लोकायुक्त कार्यालय भोपाल तथा विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की ओर प्रेषित की शिकायतकर्ता किशनबाबू गुप्ता की शिकायत लोकायुक्त कार्यालय भोपाल को दिनांक 05.07.2005 को प्राप्त होने पर प्रकरण क्रमांक 964 / सी दिनांक 05.07.2005 पंजीबद्ध कर जांच निर्देशानुसार तकनीकी शाखा लोकायुक्त कार्यालय भोपाल द्वारा की गयी तथा संबंधित निविदा क्रमांक 05/2004-2005 से संबंधित अभिलेख, मूल निविदा ओपन रजिस्टर, मूल पुनरीक्षित ऑफर आदि दस्तावेज मंगाकर अवलोकन किया गया तथा आरोपीगण अशोक हीरालाल प्रधान तत्कालीन कार्यपालन यंत्री लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी खण्ड उमरिया, व्ही. के. मरावी तत्कालीन सहायक यंत्री लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी खण्ड उमरिया एवं आर.एल. विश्वकर्मा तत्कालीन मानचित्रकार लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी खण्ड उमरिया के कथन लिए गए और आरोपीगण का कृत्य आपराधिक श्रेणी का पाये जाने पर प्राथमिक जांच क्रमांक 32/10 दिनांक 30.09.2010 को विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त कार्यालय भोपाल में पंजीबद्ध किया जाकर प्रारंभिक जांच की गयी।

    अभियोजन ने प्रकरण में अभियुक्त ए.एच. प्रधान के विरूद्ध धारा 471, 477क सहपठित धारा 120 बी भा.दं.वि. अभियुक्त आर.एल. विश्वकर्मा के विरूद्ध धारा 468, 471, 477क सहपठित धारा 120बी भा. दं. वि. एवं अभियुक्त व्ही. के. मरावी के विरूद्ध धारा 468 सहपठित धारा 120 बी भा.द.वि. के अपराध का आरोप संदेह से परे प्रमाणित किया है एवं एडीपीओ के0 आर0 पटेल ने विशेष न्‍यायालय से आरोपीगण को उपर्युक्‍त धाराओं में अधिकतम दण्‍ड देने का निवेदन किया गया । प्रभारी डी0डी0पी0/डी0पी0ओ0 श्रीमती अर्चना मरावी के निर्देशन में प्रकरण में प्रभावी अभियोजन संचालन श्री के0आर0 पटेल एडीपीओ द्वारा किया गया ।    

       उक्‍त प्रकरण में दिनांक 12.10.2023 को विशेष न्‍यायाधीश भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम उमरिया द्वारा अभियुक्‍त  ए.एच.प्रधान को धारा 465 सहपठित धारा 120 बी भा0द0सं0 में दो वर्ष का कठोर कारावास व 2000/- अर्थदण्‍ड एवं धारा 477 क सहपठित धारा 120 बी भा0द0सं0 में पांच वर्ष का कठोर कारावास व 5000/- के अर्थदण्‍ड से दण्डित किया गया । अभियुक्‍त व्‍ही.के.मरावी को धारा 468 सहपठित धारा 120बी भा0द0सं0 में पांच वर्ष का कठोर कारावास व 5000/- के अर्थदण्‍ड से दण्डित किया गया । अभियुक्‍त आर.एल. विश्‍वकर्मा को धारा 468 सहपठित धारा 120बी भा0द0सं0 में पांच वर्ष का कठोर कारावास व 5000/- के अर्थदण्‍ड ,धारा 465 सहपठित धारा 120 बी भा0द0सं0 में दो वर्ष का कठोर कारावास व 2000/- अर्थदण्‍ड एवं धारा 477 क सहपठित धारा 120 बी भा0द0सं0 में पांच वर्ष का कठोर कारावास व 5000/- के अर्थदण्‍ड से दण्डित किया गया  है।

गौरतलब है कि पीएचई की और भी जांच करवाई जाए तो ऐसे कई प्रकरण सामने आएंगे। यह तो उस ठेकेदार ने शिकायत किया तब कहीं जाकर 18 वर्ष में न्याय मिल पाया। देर से ही सही न्यायालय ने पीड़ित को न्याय तो दिया। 5 वर्ष तो विभागीय जांच करने में समय लगाया गया, उसके बाद लोकायुक्त में प्रकरण पंजीबद्ध किया गया फिर उनने जांच किया तब कहीं जाकर न्यायालय के पास मामला पहुंचा। यदि ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की तत्काल जांच कर उनको अंजाम तक पहुंचाया जाए तो भ्रष्टाचार घटने की संभावना हो सकती है।

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