Home राज्य कौमी एकता का प्रतीक मातमी पर्व मोहर्रम – सुरेन्द्र त्रिपाठी

कौमी एकता का प्रतीक मातमी पर्व मोहर्रम – सुरेन्द्र त्रिपाठी

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मोहर्रम

उमरिया 21 सितम्बर – मुस्लिम समुदाय का मातमी पर्व मोहर्रम तो पूरे विश्व में मनाया जाता है लेकिन उमरिया जिले में कुछ अलग ही तरीके से मनाया जाता है। यहां हिन्दू और मुसलमान में फर्क करना दूभर हो जाता है। सन 1881 से अब तक दोनों ही धर्म के लोग दिल से भाग लेते हैं, 80 प्रतिशत हिन्दू इस मातमी पर्व में शामिल होकर इसकी शोभा बढाते हैं, वहीँ हिन्दू परिवार की चौथी पीढी लगातार ताजिया बना रही है और बराबर श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं |

हसन हुसैन की याद में मनाया जाने वाला यह मातमी पर्व मोहर्रम दुनिया के हर देश में मनाया जाता है। लेकिन उमरिया जिले में मनाया जाने वाला मोहर्रम कुछ अलग ही तरह का है। कैम्प के रहने वाले मोहम्मद साबिर अंसारी बताते हैं कि मोहर्रम की पहली तारीख से हिन्दू और मुसलमान दोनों शेर बन कर हर अखाड़ों में नाचते हैं वहीं सन् 1881 से लगातार बाबा की सवारी आती है, वह भी हिन्दू को। सवारी की शुरुआत बाबा गुलाब सिंह से हुई, उनके बाद उनके पुत्र बाबा फूल सिंह को आने लगी और उनके मरने के बाद बाबा सुशील सिंह को आने लगी। बाबा सुशील सिंह पेशे से शिक्षक हैं लेकिन बाबा हुजूर की सवारी इनको आती है। शुरु से ही यहां हिन्दू और मुसलमान दोनों बढ – चढ कर भाग लेते हैं, यहां तक कि सवारी के समय में दोनों में फर्क करना मुष्किल हो जाता है।

अब जरा देखें हिन्दू इसमें कैसे शरीक होतें हैं और कितनी गहराई तक शामिल हैं। आईये कैलाश गौंटिया से मिलते हैं। इनका घर देखिये, हर कोई घर देख कर धोका खा जायेगा कि ये किसी मुसलमान का घर है, इनके घर के सामने भोले बाबा का मंदिर भी है। अब अंदर चल कर देखिये यहां क्या हो रहा है। पूरे परिवार भर नहीं पड़ोस के लोग भी ताजिया बनाने में जुटे हैं। यही भर नहीं इनकी चौथी पीढी है लगातार ताजिया बनाने में जुटी है लेकिन उसके पीछे क्या कारण है, कैलाश बताते हैं कि ताजिया बनाते हमारी चौथी पीढी है, किसी ज़माने में हमारे घर में बाबा जी के द्वारा ऐसी दुआ मिली कि जमरे घर में हमारे पुरखे ज़िंदा हुए थे तब से हमारे घर में लगातार हर मुहर्रम में ताजिया बनाने का काम चल रहा है वहीँ कह रहे हैं कि हम जब तक ज़िंदा रहेंगे बनाते रहेंगे ये परम्परा हमारे घर में चलती रहेगी अभी हम बना रहे हैं हमारे बाद हमारे बच्चे भी बनायेंगे, ताजिया बनाने के बाद मुहर्रम की 9 तारीख को बाबा हुजुर के दरबार में लेकर जाते हैं उसके बाद फिर दशमी तारीख को बाबा हुजुर के दरबार में ईमाम बाड़े में जियारत के लिए ले जाते हैं फिर वहां से शाम को करबला में ठंडा कर देते हैं |

पिता तो पिता है पुत्र बाबा गौंटिया भी कहता है कि ताजिया का काम कर रहा हूँ अभी बताशा बना रहा हूँ, मैं बचपन से ताजिया बना रहा हूँ मेरे दादा जी और पापा जी सब मिल कर बनाते हैं और यह काम करते ही रहेंगे, हम सब घर के लोग मिल कर बनाते हैं और बनाते ही रहेंगे |

उमरिया में पुरुषों से पीछे महिलायें भी नहीं हैं सुनिये रजिया अंसारी लयबद्ध मर्सिया सुनाटी हैं |

इतना ही नहीं उमरिया में बाबा की सवारी से लाभ पाये लोगों में कैसी आस्था है। इसका नमूना हैं छिंदवाड़ा से आये हुकुम बाबा। ये 1965 से लगातार हर साल मोहर्रम के समय उमरिया आकर करबला की सेवा करते हैं। ये हर साल आना और करबला की सेवा करना अपना कर्तव्य समझते हैं और कहते हैं कि हमारी डियूटी है। इनको न खाने की चिंता है न रहने की, यहां मुस्लिम समाज के लोग घर के सदस्य की तरह इज्जत से रखते हैं | हुकुम बाबा बताते हैं कि हमारी मन्नत पूरी हुई थी इसलिए बाबा का हम पर कर्ज है जब तक जिन्दा रहेंगे आते रहेंगे |

चार पीढी से लगातार हर साल ताजिया बनाते आ रहे इस परिवार की मदद करने मोहल्ले के कई लोग आ जाते हैं और चार से पांच दिन में ताजिया बना कर तैयार कर देते हैं। वहीं धर्म के बारे में इनका नजरिया है कि दोनों को हमेषा मिल – जुल कर रहना चाहिए लोग इनके जैसा ही सोच रखने लगे तो दुनिया में अमन – चैन और भाई – चारे की कमी ही नहीं होगी। आवष्यकता है लोगों को अपना नजरिया बदलने का |

 

 

 

 

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