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चंबल नदी: पांच नदियों का संगम, फिर भी ना पूजे जाने का गम

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हमारे देश में जहां भी दो नदियों का संगम होता है वो स्थान धार्मिक रूप ले लेता है जिस तरह से तीन नदियों के दुर्लभ संगम प्रयागराज, इलाहबाद को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समझा जाता है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पांच नदियों के इस संगम स्थली को त्रिवेणी जैसा कोई भी धार्मिक महत्व क्यों नहीं मिल पाया? खूखांर डाकुओं की शरणस्थली बनी चंबल घाटी दुनिया की एक ऐसी इकलौती जगह है जहां पर पांच नदियों का संगम स्थल है लेकिन अर्से से यह उपेक्षा का शिकार बना हुई है।

मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में बसा जानापाव नामक तहसील जो विंध्य की पहाड़ियों से घिरा हुआ हैं. इन्हीं पहाड़ियों में जमदग्नि ऋषि का आश्रम है। इसा आश्रम में बने एक कुंड से कई नदियां निकलती हैं. इन्हीं नदियों में से एक नदी है चंबल।

पांच नदियों का यह संगम स्थल महाभारत कालीन सभ्यता से जुड़ा हुआ है क्योंकि पांडवों ने अज्ञातवास इसी इलाके मे बिताया था। जिसके प्रमाण ज भी यहां देखने को मिल सकते है। महाभारत मे जिस बकासुर नामक राक्षस का ज्रिक किया जाता है उसे भीम ने इस इलाके के एक ऐतिहासिक कुएं मे मार गिराया था।

इस नदी को लेकर एक  धारणा और छुपी हुई है। और ये महाभारत में भी दर्ज है। इस जनश्रुति के मुताबिक मध्यप्रदेश के मुरैना में चंबल नदी के किनारे पर कौरवों के मामा शकुनि का राज था। कहा जाता है कि कौरव और पांडव के बीच जुए का खेल इसी स्थान पर हुआ था जहां इस जुए में पांडव ने हारने के बाद द्रौपदी को दांव पर लगाने को कहा गया था। पत्नी को भी हार जाने के बाद इसी नदी के किनारे बसे राज में दुर्योधन के भाई दुशासन ने द्रौपदी के चीरहरण किया था। तब द्रौपदी ने नदी को शाप दे दिया था और कहा था कि जो भी इस नदी का पानी पिएगाा, उसका नाश हो जाएगा।

तब से लेकर आज तक उस श्राप का असर कहिए या फिर चंबल की बनावट, चंबल के किनारे कभी भी घनी बस्ती का इतिहास नहीं मिलता है। इस नदी का पानी खूब साफ होने के बाद भी इसके आस-पास के इलाके में खेती का नामोनिशान तक नहीं है। चंबल के किनारे फैले इसी इलाके को बीहड़ कहा जाता है। मध्यप्रदेश से निकलकर राजस्थान होते हुए उत्तर प्रदेश के मुरैना में यमुना से मिलने के दौरान ये नदी कुल 960 किलोमीटर की यात्रा तय करती है. और इस 960 किलोमीटर की लंबाई में नदी के किनारे बस्तियां नहीं हैं। सिर्फ नदी है, उसकी गाद है और जंगल हैं।

 

लेकिन ये बात आज तक कोई नही जान पाया कि चंबल के बीहड़ में ऐसा क्या है कि यहां पर सिर्फ डकैतों का डेरा होता है। चंबल का इतिहास डकैतों से भरा पड़ा है। कुछ लोगों का मानना हैं कि चंबल के पानी की तासीर ही इतनी गर्म है कि वो अपमान बर्दाश्त नहीं करती है और बदला लेने के लिए उकसाती है। कुछ लोग इसे परशुराम के क्रोध से जोड़कर देखते हैं।

बैसे माना जाये तो अंग्रेजों को भी अपने शासनकाल के दौरान चंबल की बगावत झेलना पड़ा था। जिनेके उपर मान सिंह नामक बागी काफी भारी पड़ा था मानसिंह ने साल 1935 से लेकर 1955 के बीच 1,112 डकैतियां की थीं। राठौड़ राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मानसिंह ने 20 साल में कुल 182 हत्याएं की थीं, जिनमें 32 तो पुलिस के अधिकारी थे। बेटे, भाई और भतीजे की बदौलत 20 साल तक चंबल की घाटी में एकछत्र राज करने वाले मानसिंह के सामने अंग्रेजों नें भी घुटने टेक दिये थे लेकिन आजादी के 8 साल के बाद मानसिंह को मारने के लिए सेना लगाया गई और 1955 में मानसिंह अपने बेटे के साथ मारा गया।

‘चंबल का पानी काफी साफ होने के साथ इसमें आयरन की मात्रा ज्यादा होती है। यह खाने को तीन-चार घंटे में ही पचा देता है। जिसकी वजह से बार-बार भूख लगती है। इसका पानी से एग्रेशन बढ़ता जाता है। किसी बात को सहने की क्षमता खत्म होती जाती है। अपमान के साथ बदला लेने की भावना चंबल में एक नए डकैत के गैंग की शुरुआत करती है। और इसी तरह से इस चंबल की घाटी डाकूओँ की शरणस्थली बनती जाती है।

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